Thursday, January 20, 2022

४.सागर की करुणा या करुणा का सागर-एक गज़ब प्रेमकथा!!

 

 

 

जूही अपनी पड़ोसवाली चाची के संग गाँव की एक नदी पर कपड़े धोने आई है.. अक्सर गांव के लोग हफ्ताभर के मैले कपड़े, खासकर के बड़ी चद्दर या कम्बल धोने के लिए इस नदी पर आते है, साथ मे अडोस-पडोस की लड़कियों को हाथ बंटाने हेतु ले आते है..वहाँ नदी पर गांव की और भी औरतें कपड़े धोने आई थी... सवेरे आठ नव बजे ये औरतें नदी पर आ जाती है और सूरज सिर पर आने तक कपड़े सुखाकर अपनेअपने घर चली जाती है।

यह नदी बहोत ही विशाल और सदा बहती रहती है...एक तरफ पक्के पत्थरों से छोटासा बांध बंधा है..उस बांध के नीचे से बहता हुआ पानी आगे एक खाड़ी में आता है, उस खाड़ी के आसपास पत्थर की चट्टानें है, जिसपर ये औरते अपने धुले हुए कपड़े सुखाते है। बारिश अगर ज़्यादा हो जाती है तो नदी तूफानी बन जाती है और बांध के ऊपर से पानी बहने लगता है, ऐसे में वहाँ जाना खतरनाक होता है। पर आज बारिश नही है..थोड़ी धूप खिली है जिससे कपड़े सूखाने में आसानी हो जाती है, कल रात जो बारिश हुई थी उसकी हल्की भीनी भीनी मौसम की ठडक वातावरण में बिखरी हुई है। मानसून कल शाम से अपनी आहट दे चुका है।

जूही, चाची के धुले हुए कपड़े ले जाकर चट्टानों पर सुखाने के लिए कपड़ो को फैलाकर, उसके कोनों पर छोटे मोटे पत्थर रख रही है, जिससे हवाओंसे कपड़े उड़ न जाए।

दूसरी ओर से शुभम अपने एक दो साथियों के साथ वहाँ से गुज़र रहा था कि उसके एक दोस्त ने कहा "अरे वो देखो भाभी!!" ...शुभमकी नज़र जूही पर पड़ी। वो लोग अब जूही की तरफ आए...शुभम ने जूही से कहाँ "हमारे घर आओगी तो ये सब करना नही पड़ेगा"  कहेते हुए उसने जूही की बाह को थामना चाहा...जूही ने उस से बचने के लिए अपने आप को थोड़ासा पीछे की और किया...शुभम के दोस्त हंसने लगे..गांवकी कुछ औरतें भी हसने लगी..एक ने तो कहा "ए छोरी, काहे इतना घमंड दिखावत हो...ब्याह तो इससे करना है फिर?"  शुभम हँसते हुए फिर जूही की और बढ़ा..और उसकी कलाई पकड़ ली...जूही ने खीज में अपनी पूरी ताकत से शुभम को धक्का दिया...शुभम का बेलेंस बिगड़ा और उसका पैर उस चट्टान की चिकनाहट से फिसला औए वो उस चट्टान से नीचे की और लुढ़का..और उसका सिर एक नोकिली चट्टान से टकराया!! ..शुभम इस घटना से बेहोश हो गया। उसके दोस्त उसे उठाकर घर की और चल पड़े किसी एक् को बाइक लेकर डॉक्टर बुलाने को भेजा।

जूही इस घटना से स्तब्ध हो गई। चाची भी घबरा गई और गीले ही कपड़ों को समेटे हुए जूही के साथ घर की तरफ चल पड़ी। रास्ते मे चाची की कुछ बुदबुदाहट चलती रही, जूही चुपचाप चलती रही मनोमन प्रार्थना कर रही थी कि शुभम को कुछ हो न जाए।

जूही घर पहोंची और रोते हुए मा को सारी बात बताई..चाची भी आई वहा और कहने लगी " इसकी कोई गलती नही थी, शुभम का पैर फिसलने से वो गिर गया!! चाची वहा से दौड़ी दौड़ी शुभम के घर की और चल पड़ी। मा ने नाराजगी से जूही को बहोत भला बुरा कहा, जूही चुपचाप सुनती रही..उसे अपनी गलती का अहसास था।

इधर माँ ने बातों बातों में जूही को एक और  दिल दहलाने वाली बात कह दी "  ..वासवा का वो लड़का जो कल तुझे बाइक पर छोड़ने आया था...जाते हुए रास्ते मे ही उसका एक्सीडेंट हो गया और वो जगह पर ही मर गया!!" जूही को समझ मे नही आया कि वो क्या करें? उसका दम घुटने लगा..माँ भी शुभम के हालचाल पूछने उसके घर गई...जूही ने अपने आपको पलंग पर बिस्तर में झोंक दिया, और सिसकियां लेकर रोने लगी...वो सागर के लिए दिल खोलकर रो भी नही पाती।

जूही की माँ शुभम के घर जा ही रही थी, तब सुबहवाली चाची वहाँ से आ रही थी उसने कहाँ " जूही की माँ, अभी  तुम्हारा वहाँ जाना ठीक नहीं है..डॉक्टर ने जवाब दे दिया है, शुभम चल बसा है..उसकी माँ  इसके लिए रो रोकर जूही को ही जिम्मवार बता रही है..."

तब जूही की माँ ने कहा.."जो भी कहे मैं सुन लूँगी...वैसे गलती तो जूही की है ही..." ये कहकर.. वो वहाँ जाने लगी।

वहाँ का माहौल बहोत ही हृदयविदारक था..जवान बेटा जो चल बसा था...जूही के पिता भी वहाँ कुछ पुरषों के साथ ग्लानि के साथ खड़े थे..जूही की माँ वहाँ पहोंची और उसने शुभकी रोती बिलखती माँ को थाम लिया और वही उसके साथ बैठ गई...शुभम की माँ "हाय रे मेरा बेटा" कहकर और भी जोरो से फुटफुटकर रोने लगी!! शुभम का निस्चेतन शरीर सामने ही पलंग पर लेटाया हुआ है और उसके तन पर चादर ओढाई हुई है..चहेरा खुला रक्खा है।

बाहर गांवके लोग अंतिम संस्कार की तैयारियों में जुटे हुए है..वातावरण भारी विषाद से भरा हुआ है।

इधर जूही को समझ नहीं आ रहा वो क्या करें..वो मन ही मन रोये जा रहीं है... पर सागर के लिए खुलकर रोना चाहती है पर वो अडोसपड़ोस के लोगों में सोचते, ऐसा करना उसके लिए ठीक नही था...तब सुबहवाली चाची वहाँ एक दो औरतों के साथ आई...और जूही की बाँह पकड़कर उसे झिंझोड़ा और कहाँ...अरे बिटियां ...तेरा तो भाग ही फुट गया..शुभम चल बसा..."

जूही ने जो अबतक रोक रक्खा था वो बांध खुल गया...वो जोर जोर से रोने लगी...कुछ लोग अब उसके घरमे जमा हो गए..उतने में जूही की माँ वहाँ आ गई..." हाय रे अभागन ये क्या कर दिया??" कहकर उससे लिपट गई..जूही भी माँ से लिपटकर रोने लगी...उसे अपने भाग्य पर सचमुच बड़ा दुःखद आश्चर्य हो रहा था...की कैसे भाग्य एक रात में पलट गया...कैसे एक रात में सुहागिन से विधवा हो गई!!

तब ...एक युवक वहाँ पर दौड़ा हुआ आया...और कहाँ "शुभम भैया में फिर से जान आ गई"

ऐसा सुनतें ही सभी आनंद और आश्चर्य मिश्रित भाव सहित, एक एक करके शुभम के घर की तरफ रवाना हुए...जूही और उसकी माँ दोनों ही अब घरमे रह गए...माँ ने उसके आंसू पौंछते हुए कहा "अब सब ठीक हो जाएगा" ।
जूही इस बात स्तब्ध थी..उसके लिए भी यह खबर सांत्वना दे रही थी..पर उसने अपने जीवन से जो गंवाया है, उसके बारेमें वो किसीसे एक शब्द भी नही कहे पा रही..!!

मनुष्य की विवशता की यह एक करुण स्थिति होती है, जहाँ अपना दुःख किसीके साथ बांटना भी असंभव सा हो जाता है।

उधर शुभम के घर का ग़मगीन वातावरण औरतों के रोने धोने के बीच में अचानक बदलाव आया.. जब वहाँ खड़ी छोटी सुमन ने देखा की शुभम के चहेरे पर कुछ हल्कीसी हलचल हो रही है उसने तभी  कहा..."देखो शुभम भैया को..देखो आंखों की पलके हिल रहीं है."...तभी शुभम की माँ झटके से उठके शुभम के सिरहाने गई और रोती हुई.. हल्के सेउसके चहेरे को थपथपाती हुई बोली "ए बिटवा शुभम....शुभम.." बाहर जो पुरुष थे उनमें से कुछ अंदर आ गए...कोई कहने लगा "सबलोग एक तरफ हो जाए..गिर्दी कम करो...थोड़ी हवा आने दो.." शुभम के शरीर मे फिर चेतनता आने लगी और वो बुदबुदाया "करुणा...करुणा.….." किसीके समझमे नही आया क्या कहना चाहता है वो...पर माने कहाँ " हां बेटा हां...भगवान की बड़ी करुणा है"...शुभम के शरीर ने धीरे से आंखे खोली..वो कुछ आश्यर्य भरी नजरों से देख रहा...और सर की चोट से कराहने लगा...तब किसीने कहा जाओ डॉक्टर को वापस बुला लाओ... तुरन्त बाहर बाइक स्टार्ट होने की आवाज़ आई..और कोई बाइक पर डॉक्टर को वापिस लाने गया!! किसीने कहा सब लोग बाहर आ जाओ..कमरे में हवा आने दो... शुभ के पिता ने आकर चादर हटा दी..उसकी मां ने दूसरी चादर दी जो उसके पिताने शुभको ओढाई..और शुभम की माँ से कहा "इसे अब आराम करने दो ..थोड़ी देर में डॉक्टर आ जाए..फिर देखते है' शुभम ने अब आंखे बंद की उसकी सांसे पूर्ववत चलने लगी..चहेरे पर अनजान भाव आ रहे थे क्योंकि...भीतर से सागर इस परिस्थिति से कैसे संभले, ये सोच रहा था।

थोड़ी देर में डॉक्टर आ गए उन्हीने सर के चोट को देखा..जरूरी मरहम लगाई और कहा.." खून बहोत बह चुका है.. मैं मरहम पट्टी कर देता हूँ और संजोग में चिट्ठी लिख देता हूँ..वहाँ भर्ती करा दीजिए...वैसे चिंता करने की जरूरत नही है...बस थोड़ा एकाद दो दिन उसके दिमाग को जोर पड़े ऐसी कोई बात न करें"

घर की गाड़ी थी शुभम के चचेरा भाई सभीको गाड़ी में संजोग हॉस्पिटल ले जाने के लिए गाड़ी में बैठने कह रहा था तब वहां जूही और उसकी माँ आई " हम भी साथ चलते है..."  शुभम की माँ कुछ कहती उससे पहले शुभम के पिताजी ने कहा "हाँ हाँ..आप दोनों भी बैठ जाओ..मैं किसीके साथ बाइक पर आता हूँ...जूही के पिताजी भी किसीके साथ बाइक पर गाड़ी के पीछे पीछे चल पड़े..गाँव के कुछ युवा भी साथ थे..सभी संजोग हॉस्पिटल की और रवाना हुए।

क्रमशः


३.सागर की करुणा या करुणा का सागर-एक गज़ब प्रेमकथा!!

 


 

उसने देखा की वो अपने आपको बिल्कुल हल्का हल्का सा महसूस कर रहा है, कुछ दूर पर उसकी बाइक रास्ते पर पटकी पड़ी है, और उसी से कुछ कदम दूर उसका निश्चेतन शरीर!! वो कुछ सोचे उसके पहले दूर से आतीं उस प्रकाश की किरन ने जैसे उसे मोह लिया, उस मनमोहक प्रकाश की और मानो जैसे अनायास ही वो खिंचा चला गया..और इस गतिविधिमें उसने एक अपार आनंद और प्रेमका अहसास हुआ!!

कुछ क्षणोमे उसने अपने आपको एक गार्डन में बैठा पाया, वो एक सुंदर नक्काशीदार सफेद बेंच पर  बैठा है, और आसपास का वातावरण इतना सुकून देनेवाला और आनंददायक था कि उसके लिए शब्द ही न जुट सके!! उस गार्डन के फूल, फ़ूलोंके रंग, हरियाली खशबू इस धरती पर कभी न पाई जा सकेगी ऐसी अद्भुत और अलौकिक, वो स्वर्गमें था। उसे अंदर से यह एहसास हुआ जैसे वो किसीकी प्रतीक्षा कर रहा है वहाँ, और अभी कोई आएगा उसे मिलने, पर कौन आएगा उसका उसे अंदेशा नही था...वो उस परम आनंददायक वातावरण में खो सा जा रहा था....तब एक प्रकाशपुंज की बनी व्यक्ति वहाँ प्रकट हुई, मानो उस व्यक्ति का शरीर शुभ्र प्रकाश से बना हुआ है, उसने मानो क्षणभर उसे करुणाभरी आंखों से देखा, उस प्रकाशरूप आकृति का उसे इस तरहा देखना भर था कि वो  उसको देखते ही छोटे बच्चे की तरहा, हिचकियां दे दे कर रोने लगा, मानो जैसे कितने जन्मों से बिछड़कर आज मिलन हुआ हो!!

...और उस छोर से एक प्रश्न आया "कहा थे अबतक?" यह प्रश्न उसके लिए सूचक था, यह कोई शब्दो के बोल नही थे, शायद टेलीपैथी जैसा कुछ था!! यह प्रश्न उपस्थित होते ही, उसके जीवन की सारी घटनाएं जैसे किसी चलचित्र के भांति उसके मस्तिष्क की आँखों के सामने एक एक करके दृश्यमान होने लगे..बचपन के पालने से लेकर मा-बाबूजी बचपन के दोस्त, स्कूल कॉलेज के साथी उनके साथ बीते अंतरंग पल...सबकुछ एक भी घटना छूटी नहीं सबकुछ जैसा अभी घट रहा हो..और वो बिल्कुल स्तब्धसा उन घटनाओंको मानो किसी साक्षी की तरहा देख रहा हो...और अंतिम घटना के दृश्य द्रश्यमान हुए....

निशा की शादी हो चुकी है, और उसकी बिदाई की रस्म पूरी हो चुकी थी बारात अपनी गाँव दूल्हा- दुल्हन को लेकर चले गए थे और उसने देखा करुणा पीछे रह गई है, कुछ कीचड़ सा रास्ते मे होगा, जिस पर करुणा का पांव फिसला और उसके पैरोमे कीचड़ लग गया, और उसकी एक चप्पल भी किचड़वाली हो गई...तभी वो वहाँ से गुजरा था..और करुणा की सहेली उसे कहे रही थी "अरे जूही चलो..ये बारातियों की आखरी बस है और आज तो बारिश होनी है" और जूही बोली "तुम चलो मैं पैर धो कर आती हु" तभी वो वहाँ पहोचा और उसने हँसते हुए कहा था "अरे करुणा क्या हुआ? कीचड़ में पैर चला गया..हा हा हा हा" जूही ने उसे एक शरारती गुस्से भरी नजर से देखा और कहा था "तुम्हारें गांव वाले देखो कितनी गंदगी करके रखते है!!" तभी उसने कहा था "हमारे गांववाले नही..ये तुम्हारे गाँव के बारातियों की सब करतूत है हा हा हा हा" तब जूही ने कहा था "अब मज़ाक बन्द करो और पैर धुलवावो, एक तो बारिश होनेवाली है,और हमारीं बस भी अभी आखरी है" तभी सड़क के पास एक पानी की डंकी पर वो उसे ले गया और हेंडपम्प चलाकर पानी डंकी में चलाया जूही ने अपने पैर और चप्पल अच्छी तरहा से धो लिए...और फिर दोनों बारातियों की आखरी बस की और जाने लगे ..उसने पूछा था "करुणा अब फिर कब मिलेंगे? जूही ने शरारती लहजे में कहा था "मुझे क्या पता!!!

जैसे वो बस वाली जगह पर पहोचे तो देखा कि बस चली गई थी उसने वहाँ खड़े गांव के एक बुजुर्ग से पूछा "अरे काका बरातियों की बस चली गई? बुजुर्ग ने कहा "अभी अभी आखरी वाली बस निकली है" जूही का चहेरा देखते बनता था उसने सागर की और देखा "अब?? तब साग़र ने उसे कहा था "ये बंदा किस लिए है, करुणा..तुम ठहरो में अभी बाइक ले कर आता हूँ..और तुम्हे बस तक पहोचा दूंगा..जूही ने सहमति दर्शाई और सागर उसके घर बाइक लेने गया और चंद मिन्टोमे बाइक के साथ लौटा..जूही पीछे बैठ गयी और उसने बाइक स्टार्ट कर दी...यहाँ बारिश की बौछारें पड़ने लगी देखते देखते बारिश तेज़ हो गई..तब उसने सोचा कि आगे बढ़ने से अच्छा है कहीं रुक जाए...एक बड़े पेड के नीचे जा कर दोनों ख़ड़े हो गए..भीगना तो अनिवार्य था, क्योंके और बारिश से बचने का कोई उपाय भी नही!!!

उस देर शाम में बारिश की बौछार और दो प्रेमी एक दूसरे के प्रेम में आसक्त, बाहर का वातावरण आल्हादक और मन को एक अलग ही प्रकारके अहसास की और दोनों को खिंचे जा रहा था, उसने झटके से उसकी करुणा को अपनी आगोश में खींच लिया, करुणा भी निःसहाय सी उसके बाहोंमें समाने लगी...एक आह्लादक अलौकिक आकर्षण दोनों के मन से होकर तन में कब गुज़र गया कुछ पता न चला..कब करुणा सागर की हो गई और सागर करुणा का..जब अहसास हुआ जब लौकिक बातोंसे मन फिर अपना अस्तित्व पाने की कोशिश कर रहा..और दोनोंने लौकिक अहसास को पाते
ही यह समझा कि कुछ अनचाहा पर मनचाहा हो चुका था अनजाने ही या अस्तित्व के बोध के साथ ये तय करना दोनों के लिए असम्भव सा था...तब करुणा ने उससे कहा था "आज करुणा सागर की हो गई..अब ये सागर का उत्तरदायित्व है कि अब सागर करुणा का हो जाये"

इस पर उसने कहा था "अब सागर से करुणा को दुनियां की कोई शक्ति दूर नही रख सकती"  "मेरा विश्वास रखना"

तब करुणा ने कहाँ था " मुझे मुझसे भी ज्यादा अब तुम पर विश्वास है"

दोनों ने अपने आप को संभल लिया और दोनों बाइक पर फिर सवार हो गए, करुणा सागर के पीठ पर सर रखकर बिल्कुल निश्चिंत सी हो चुकी थी, बारिश रुक चुकी थी,तूफान शम चुका था..और दोनों बिल्कुल निःशब्द ..बाइक भीनी सड़क पर जूही के गांव की और दौड़ रही थी।

कुछ समय के बाद वो दोनों पहोंचे, बाराती अभी पहोचे ही थे, कुछ लोग बसों से अभी भी उतर रहे थे, तब कहीं से शुभम आया उसने जूही को सागर के साथ बाइक से उतरते देखा और उसके मन में एक अनजाना सा पर अनिच्छनिय भाव आ गए..उसने पूछ लिए "कहा रुक गयी थी? सभी के साथ आने को नही हुआ क्या? मुन्नी तो तुम्हारे साथ थी!!"

सागर ने सारी हक़ीक़त शुभम को बताई की, वो किस तरहा कीचड़ में पैर फिसला और लास्ट बस छूट गयी। सागर और शुभम के साथ यही एक मुलाकात रही.. वहां पर चिंतित होते जूही की मम्मी आ गई जूही उनके साथ हो गई और सागर अपनी बाइक लेकर लौट पड़ा था अपनी गाँव की और...

सागर रोने लगा उसने उस प्रकाशपुंज व्यक्तित्व से कहाँ "है भगवन है विधाता..मैं करुणा के बगैर संसार मे कहीं भी नही रहे सकता...मुझे जाना होगा..उस पर तो न जानें क्या गुजरेगी? वो सह नही पाएगी प्रभु..मुझे जाना है..मुझे जाना ही होगा!!

उस दिव्य पुरुष ने कहां "पर तुम देखो ..तुम्हारा पार्थिव शरीर अब किस काम का नहीं रहा..और लोग उसके अंतिमसंस्कार की विधि भी कर रहे है...सागर ने देखा उसकी माँ बार बार सदमें से बेहोश होती जा रही है, उसके पापा बिल्कुल निश्चेतन से अपलक नज़रो के साथ गुमसुम से बैठे थे और और गांव के लोग उसके पार्थिव शरीर की अन्तिमयात्रा की विधि कर रहे थे...सागर ने देखा सबकुछ खत्म हो चुका है...पर करुणा से किये वादे को याद आते ही अवसाद में डूबे स्वर में उसने कहा "प्रभु दया कीजिए"

उस प्रकाशपुरुष ने कहा..."पुत्र तुम्हारी जिजिविषा और अंतिम कर्म के फल की पूर्ति के हेतु ..और तुम्हारी जिद्दभरी आह और चाहना से मुझे विधि के लेख में बदलाव नज़र  आ रहा है....जाओ वहाँ जूही का मंगेतर प्राण त्याग रहा है..उसके शरीर मे चले जाओ...सागर ने पूछा कैसे...दिव्यात्मा ने उसके कपाल के स्थान पर आए आज्ञाचक्र पर स्पर्श किया और हल्का सा दबाव दे कर कहा " ऐसे!!"

और सागर अब शुभम के पार्थिव देह में आ चुका था और शुभम एक लंबी परलोक यात्रा के लिए उसका पार्थिव शरीर हमेशा के लिए छोड़ चुका था!!!
क्रमशः


२.सागर की करुणा या करुणा का सागर-एक गज़ब प्रेमकथा!!

 


 

एक बच्चे ने दौड़ते हुए आकर कहा " अरे बारात आ गईं है...केनाल बावड़ी तक पहोंच गई है...

ये सुनते ही दुल्हन के घरका माहौल गरमा गया..किसी बुज़ुर्गने कहा "चलो भाई बारातियों के स्वागत के लिए आगे चलते है" कुछ पांच छह लोग उठ खड़े हुए "चलिए ..चलिए"

केनाल बावड़ी एक लैंडमार्क था जो शादी के स्थल से पांचसौ  मीटर की दूरी पर होगा...हालांकि बारात को यहाँ तक आते आते लगभग एकाध या ड़ेढ घण्टा लग सकता है...क्योंकि वहाँसे बाराती बेंड के साथ नाचते हुए आते है। करीब दोपहर के एक बजे का समय होगा..शादी का मुहुर्त तीन से साढेचार बजे तक का है, उस हिसाबसे बारात लग्नमड़प तक पहोंच ही जाती है।

दुल्हन के घरकी और आसपास की महिलाओं की चहल पहल और बढ़ गई...वैसे कोन क्या कह रहा है, क्या कर रहा है इस बात का कोई ज्यादा महत्व नही है उतना,  पर उत्सुकता और उत्साह कुछ ज्यादा बढ़ जाते है। दुल्हन के लिए ब्यूटीपॉर्लर वाली महिला की व्यवस्था की गई है, जो दुल्हन का सारा साज-सँवरने का काम सम्भाल लेती है, मेहंदी वालीने तो अगले दिन दुपहर में ही दुल्हन के हाथोंमें खूबसूरत मेहंदी रचा ली थी, बाकी मौसी, दीदी, फूफी, भाभी वगेरे ने भी अपने अपने हाथोंमें महेंदी लगवा दी थी, यह आजकल जरूरी हो गया है, मेहंदी और ब्यूटीशियन। खाने के कुक का इंतेजाम होता है जो अपनी टीम के साथ अगले दिन रातमे ही आ जाता है, और जो भी पकवान या मिठाई बनानी होती है उसकी तैयारी में जुट जाता है, यह खाना बारातियों और स्नेहीजनों के लिए तो होता है साथ ही साथ सारे गांवके लिए भी खाने की भी यह व्यवस्था होती है। कुल मिलाकर पूरे गांवमें एक उत्सव का सा माहौल होता है।

बारात पहोंच रही है यह बात बेंडबाजेकी धुनोंसे पता चल जाता है। बारात कुछ दस पंद्रह किलोमीटर दुरके गांवसे आई है, जिंसमे सारी बारात लक्ज़री बसों में आती है, दूल्हे के लिए एक सजावट वाली कार होती है जिंसमे दूल्हे के मातापिता और साथमे शादीशुदा बहन सजी हुई थाली के साथ बैठती है। यहाँ रिवाज ऐसा है कि दुल्हन के परिवार की ओर से एक घोड़े की व्यवस्था की जाती है, जिसपर बैठाकर दूल्हे को लग्नस्थल तक लाना होता है, घोड़े की व्यवस्था लगभग दुल्हन के फुफ्फी की और से ही किया जाता है।

गांव की अंदर आती एक हुई सड़क  है जो गांव के प्रवेश द्वार से होकर गांवके अंदरूनी विस्तारमे जाती है, जहाँ चारो और लगभग सौएक घर होंगे, गांव में शादी होती है तो सभी परिवार उसमें शरीक होते है, सभी एकदूसरे के प्रति प्रेम और आदर के भाव सहित रहते है, गांव में समाजके मुताबिक अलग अलग कस्बे है, जो उनके अपने अपने विस्तारमे रहते है, जिंसमे आसपास अलग अलग जाती के लोग बस्ते है, और वो एकदूसरे के साथ कोई दखलंदाजी नही करते।

बारात के स्वागत के लिए गांवके प्रवेशद्वार पर कुछ बुज़ुर्ग लोग आए हुए है, साथ मे गांवके मुखिया और गांव के कुछ कार्यकर्ता भी शामिल होते है। यहाँ पर दूल्हे को घोड़े पर सवार होकर लग्नमंडप तक ले जाया जाता है, जो दुल्हन के घर के आँगनमे ही होता है।

एक सफेद रंग का खूबसूरत घोडे को सजाकर दूल्हे के लिए तैयार है, उसका रखवाला घोड़े की लग़ाम लिए खड़ा है, जो घोड़े के साथ साथ लगामको पकड़े हुए साथ साथ चलता है, और घोड़ा उसके काबू में रहता है।

बारात गांव के प्रवेशद्वार पर आ गई है, कुल दोसौ तिनसों बाराती होंगे, कुछौकी अपनी खुदकी कारें है, बाकी जो बसोमे आये थे, वो केनाल बावड़ी से बारात के साथ पैदल चलकर आये है, कुछ युवा लड़के लडकिया बैंडबाजे में बजती फिल्मीधुनो पर नाच रहे है, उनमे कुछ महिलाएँ और पुरुष  भी है, जो अपनी अपनी मस्ती में एकदूसरे के साथ मस्ती मजाक करते हुए नाच रहे है, कुछ प्रोफेशनल तरीके से नाचने का प्रयास करते रहते है, जिनको शादियोंमें नाचनेका खूब अनुभव होता है, तो कई ऐसे भी है जो पहलीबार किसीके जबरजस्ती खिंचे जानेपर बेंड से ताल मिलानेका असफल प्रयास करते है, शरुआत की ज़िज़ेक थोड़ी देर में भीड़मे खो जाती है और अगली किसी शादी तक ये भी अपनेआपको नाचने लायक बना ही देंगे। जो दूल्हे के नज़दीकी रिश्तेदार है, उनको जैसे नाचना खूब जरूरी हो वैसे  बरातमे सभी से आगे, हाथोंको लहरालहरा कर नाचते है, ताकि फ़ोटो में बराबर क्लिक होते रहे और विडियोशूटिंग वाला भी मजबूर हो जाये उन्हें विडियोमें कैद करने के लिए।

दुल्हा एक सजावट वाली सफेद गाड़ीसे, जिसको गुलाब और अन्य फूलोंसे खूब सजाया हुआ है, पिछली सीटका दरवाजा खोलकर बाहर निकलता है, एक खूबसूरत जोधपुरीं जामे में सज्ज हैंडसम दूल्हा है, दुल्हन की और से स्वागत में आये हुए लोग दूल्हे से और उनके परिवार के सदस्यों से हस्तधनून और नमस्कार करके हास्य द्वारा औपचारिकता निभाते है, कोई कहता है "अरे भाई घोड़ा यहाँ पर ले आओ" घोडेवाला अपने सजे हुए घोडे को दूल्हा जहाँ खड़ा है वहाँ ले आता है, दूल्हे की शादीशुदा बहन जो उसके साथ है वो इस पूरी शादिमे अपने पति के साथ दूल्हे के साथ साथ हरकदम पर रहती है, जीजाजी ने दूल्हे के सर पर पहना हुआ साफा सही और गले का हार ठीकठाक किया, दूल्हे को रुमाल दिया जिससे उसने अपने चहेरे को हलका सा पफ कर लिया, दूल्हे को घोड़े पर बिठाने के लिए जीजाजी और कुछ दोस्तोने मदद की, अब उस खूबसूरत घोड़े पर दुल्हेराजा सवार हो चुके, उसके हाथोंमें फुलोंका एक गुलदस्ता और नारियल थमा दिया, तभी दूल्हे की भाभी अपने चार साल के बच्चे को दिखाते हुए बोली "इसको बिठा दो साथ मे घोड़े पर आगे" किसीने बच्चे को उठाया तो बच्चा डरने लगा घोड़े के सामने जाकर तब भाभी बोली " अरे कुछ नही होता, देख चाचू है ना, उनकी गोदी में बैठ जा" तभी एक लड़के ने बच्चे को उठाकर दूल्हे के साथ आगे बिठा दिया, दूल्हे ने उसे अपने आगोश में ले रखा था, जिससे बच्चा अब स्वस्थ हो गया और मम्मी जी को भी राहत। बारात अब दुल्हन के घर की और प्रस्थान करने लगी कुछ लड़के लड़कियां और कुछ महिला और पुरुष बारातमे आगे आगे नाच रहे है, उनके पीछे बैंडबाजा वाले और उनके पीछे घोडेपर सवार राजकुमार की तरह आकर्षक दुल्हेराजा औए उनके पीछे मंगलगीत गाती हुई महिलाएं और फिर बाकी बाराती, इस तरह पूरा रसाला विवाह स्थल याने दुल्हन के घर लग्नमड़प की और आगे बढ़ रहे है। .....इस बारातमे दो बड़ी आकर्षक आंखे है, जो बेकरारी से शायद किसीको ढूंढ रही है,  सहज सुंदर गोरा कमनीय बदन है उसका, उसके बाल काले घने और लंबे है, गोरे चहरे पर यह उसकी मोटी कजरारी आँखे लुभावनी लगती थी।  उसने गुलाबी रंग का नक्काशीदार पंजाबी सूट और जामुनी रंग का सलवार पहना हुआ है, एक तरफ कांधे पर पिंक कलर का दुपट्टा रखा है जिसके किनारों पर मोतियोंकी सुंदर लड़ी सी लटकन ने उस दुपट्टे को और भी आकर्षित कर दिया है, कुल मिलाकर कॉटन का यह खूबसूरत वस्त्रपरिधान उसपर फबता था!! पूरी बारात के  शोर शराबे और चकाचौंध में अगर कोई युवा उसको पलभर देख लेता है, तो उसकी सादगी से स्तब्ध हो जाए और आसपास का बारात का शोरगुल वाला वातावरण अचानक ही उसे बड़ा ही  परमशान्ति प्रिय लगने लगे, वैसे इस गांव के कई युवा उसकी सुंदरता को एक नज़र देख कर धन्य हो रहे थे।....पर उस मानूनी को इस बात का जरा सा भी अंदेशा न होगा शायद, क्योंकि उसकी वो कजरारी आंखे किसी विशेष आंखों के मिलन को उत्सुक थी....जो कहीं दिखाई नही दे रही थी।

क्रमशः


१.सागर की करुणा या करुणा का सागर-एक गज़ब प्रेमकथा!!

 



बारिश हो रही है शाम साढ़ेसात या आठ बजे करीब का समय होगा, और वो तेजी से गांव की पक्की सड़क पर अपनी मस्तिमें बारिश में भिगने का पूरा आनंद लेता हूआ, अपनी बाइक पर संवार हो कर अपने घर की और जा रहा था! बारिश की बरसती बूंदों में भी, पूरी तरहसे खिला हुआ चंद्रमा वातावरण को आह्लादक बना रहा था, उसने सोचा न था कि, बारिश इतनी तेज हो जाएगी, आज पहले ही दिन बारिश ने अपना रंग दिखा दिया!!

...बस अब घर के करीब एक किलोमीटर की दूरी थी कि, एक बिजली का खंभा उखड़कर सड़क पर आ गिरा, वो कुछ सोचे संभले उसके पहले उसने काबू खोया और उसकी तेज बाइक उस सड़क पर गिरे खंबे से टकराई और एक जोरदार झटके के साथ वो उछला और उसके हाथों से बाइक का हेंडल छूट गया और वो एक ऊंचाई तक उछल कर पक्की सड़क पर उल्टे सिर गिरा, एक फटाक सी आवाज़ हुई और वो बेहोश हो गया!!

....कुछ क्षणों के बाद वो उठा, उसने पाया कि वो बिल्कुल हल्का सा महसूस कर रहा है, उसने अपनी बाइक के बारेमे सोचा और वो इधर उधर देखें या कुछ सोचे उसके बिल्कुल सामने एक प्रकाशकी किरन सी दिखाई दी और उसे ऐसा लगा या वो यह सोच नही पाया कि, वो रोशनी की कीरन उसे आकर्षित कर रही है या वो खुद बेबस सा होकर उसकी और खींचा जा रहा है, पलक ज़पकते ही वो प्रकाश की किरन मानो एक प्रकाशपुंज बनकर उसके सामने आ गई और वो जैसे उसमे समा सा गया!!

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अरे ..उठो अभी!! आठ बज चुके है.…पड़ोस में शादी है...और तुम अभी तक सो रहे हो..चलो उठो और वहाँ जाकर कुछ काममें हाथ बंटाओ ...माँ ने ये कहेते हुए उसे बिस्तरमे ज़िंज़ोड दिया था ..

वो रात देर तक गिटार की प्रैक्टिस कर रहा था इसीलिए आंख सुबह जल्द खुल नही रही थी ...वो बिस्तरसे उठा औए दरवाजे पर रखा टॉवेल लेकर, आंखे मलते हुए सीधा बाथरूम में नहाने के लिए गया..गांवमें अब सभीके यहाँ लगभग पक्के मकान और टॉयलेट बाथरूम घरके अंदर ही बनवा लिए गए थे। वैसे वासवा गांव कहनेके लिए गांव था, शहर से कुछ अठारह किलोमीटर की दूरी पर ही था, और जबसे यहां पर शहर में इंडस्ट्रीज आ गई है लोग खेतीबाड़ी के काम से ज़्यादा इंडस्ट्रीजमें किसी कंपनी में बारह घंटे काम करना ज्यादा सहूलियतवाला समझते थे, इस वजह से गांवमें खेतके कामके लिए मजदूर बड़ी मुश्किल से मिलते है। लेकिन इस परिवर्तनमें अब सभी एडजस्ट हो गए है।

वो नहा-धोकर बाहर आया और जीन्स और टीशर्ट पहनकर रेडी हो गया तब माँने कहाँ " दस मिनिट रुक जा...गर्मागर्म पराँठे बना देती हूं चाय के साथ खा कर बाद ही जाना....एक बार वहाँ गया तो काम मे जुट जाएगा और फिर घर आना मुश्किल होगा ....और नास्ता करना रह जायेगा...

वो नाश्ते के लिए तैयार होकर कुर्सी पर बैठकर उसने सामने रखी हुई टिपोय को अपनी और खीँच लिया... माँने चाय और परांठे लाकर टिपोय पर रख दीए...."तुम्हारे पापा तो सुबह सात बजेसे ही गुप्ताजी के घर पहोंच गए है!! " माँने कहा। ..."और तुम भी पहोचो जल्दी...नहीं तो तुम्हारी शादी में कौन आएगा?" अपनी शादी की बात सुनकर उसका दिल एक पल धड़क गया और उसकी सोचमें एक पल के लिए रोक लगी...वो नाश्ता करने लगा।  आजकी शादी वैसे उसके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है, अपने बचपन के दोस्त संजूकी बहन निशिता की शादी है, निशिता  को वो भी अपनी बहन  ही समझता था, इकलौता होने से उसकी अपनी कोई सगी बहन नहीं थी।...पर ये बात उतनी महत्वपूर्ण नही थी उसके लिए जितनी निशिता की बारात के आने की उत्सुकता!!

....गांवमें शादी ब्याह में सभीके घर जाकर अपनी उपस्थिति जताने को लोग जरूरी समझते है...लोग इसे अपनी नैतिक फर्ज समझते थे सारे गांव के युवा लड़के शादीब्याह वाले घर जाकर मिलजुलकर कुछ ना कुछ काममे जुटे रहते है ...गांवकी महिलाएं कुछ कुछ समय के अंतर पर शादिवाले घर के चक्कर काटती रहती थी, शहरीकरणका एक फायदा ये हुआ कि शादी ब्याह के दिन कुक को आर्डर दे दिया जाता है ताकि घर की महिलाएं फ्री रहे और शादी में सजने धजने के लिए उनको पूरा वक्त मीले!! लड़कियां दुल्हन के आसपास उसके लाड़ लड़ाते रहते है और उनके हंसी मजाक चलते रहते है.…बूढ़े बुजुर्ग वहां पर ज्यादातर गप्पे लड़ाते रहते है मगर उनकी यह हाज़री भी ऐसे मौकों पर उस स्थान की शोभा बढ़ाती है...इतने सबकुछ के बावजूद भी घरके मालिक को हमेशा कुछ न कुछ चिंता बनी रहती है...जो अस्वाभाविक सा होकर भी स्वाभाविक होता है!!

क्रमशः


४.सागर की करुणा या करुणा का सागर-एक गज़ब प्रेमकथा!!

      जूही अपनी पड़ोसवाली चाची के संग गाँव की एक नदी पर कपड़े धोने आई है.. अक्सर गांव के लोग हफ्ताभर के मैले कपड़े, खासकर के बड़ी चद्दर या कम्बल...