जूही अपनी पड़ोसवाली चाची के संग गाँव की एक नदी पर कपड़े धोने आई है.. अक्सर गांव के लोग हफ्ताभर के मैले कपड़े, खासकर के बड़ी चद्दर या कम्बल धोने के लिए इस नदी पर आते है, साथ मे अडोस-पडोस की लड़कियों को हाथ बंटाने हेतु ले आते है..वहाँ नदी पर गांव की और भी औरतें कपड़े धोने आई थी... सवेरे आठ नव बजे ये औरतें नदी पर आ जाती है और सूरज सिर पर आने तक कपड़े सुखाकर अपनेअपने घर चली जाती है।
यह नदी बहोत ही विशाल और सदा बहती रहती है...एक तरफ पक्के पत्थरों से छोटासा बांध बंधा है..उस बांध के नीचे से बहता हुआ पानी आगे एक खाड़ी में आता है, उस खाड़ी के आसपास पत्थर की चट्टानें है, जिसपर ये औरते अपने धुले हुए कपड़े सुखाते है। बारिश अगर ज़्यादा हो जाती है तो नदी तूफानी बन जाती है और बांध के ऊपर से पानी बहने लगता है, ऐसे में वहाँ जाना खतरनाक होता है। पर आज बारिश नही है..थोड़ी धूप खिली है जिससे कपड़े सूखाने में आसानी हो जाती है, कल रात जो बारिश हुई थी उसकी हल्की भीनी भीनी मौसम की ठडक वातावरण में बिखरी हुई है। मानसून कल शाम से अपनी आहट दे चुका है।
जूही, चाची के धुले हुए कपड़े ले जाकर चट्टानों पर सुखाने के लिए कपड़ो को फैलाकर, उसके कोनों पर छोटे मोटे पत्थर रख रही है, जिससे हवाओंसे कपड़े उड़ न जाए।
दूसरी ओर से शुभम अपने एक दो साथियों के साथ वहाँ से गुज़र रहा था कि उसके एक दोस्त ने कहा "अरे वो देखो भाभी!!" ...शुभमकी नज़र जूही पर पड़ी। वो लोग अब जूही की तरफ आए...शुभम ने जूही से कहाँ "हमारे घर आओगी तो ये सब करना नही पड़ेगा" कहेते हुए उसने जूही की बाह को थामना चाहा...जूही ने उस से बचने के लिए अपने आप को थोड़ासा पीछे की और किया...शुभम के दोस्त हंसने लगे..गांवकी कुछ औरतें भी हसने लगी..एक ने तो कहा "ए छोरी, काहे इतना घमंड दिखावत हो...ब्याह तो इससे करना है फिर?" शुभम हँसते हुए फिर जूही की और बढ़ा..और उसकी कलाई पकड़ ली...जूही ने खीज में अपनी पूरी ताकत से शुभम को धक्का दिया...शुभम का बेलेंस बिगड़ा और उसका पैर उस चट्टान की चिकनाहट से फिसला औए वो उस चट्टान से नीचे की और लुढ़का..और उसका सिर एक नोकिली चट्टान से टकराया!! ..शुभम इस घटना से बेहोश हो गया। उसके दोस्त उसे उठाकर घर की और चल पड़े किसी एक् को बाइक लेकर डॉक्टर बुलाने को भेजा।
जूही इस घटना से स्तब्ध हो गई। चाची भी घबरा गई और गीले ही कपड़ों को समेटे हुए जूही के साथ घर की तरफ चल पड़ी। रास्ते मे चाची की कुछ बुदबुदाहट चलती रही, जूही चुपचाप चलती रही मनोमन प्रार्थना कर रही थी कि शुभम को कुछ हो न जाए।
जूही घर पहोंची और रोते हुए मा को सारी बात बताई..चाची भी आई वहा और कहने लगी " इसकी कोई गलती नही थी, शुभम का पैर फिसलने से वो गिर गया!! चाची वहा से दौड़ी दौड़ी शुभम के घर की और चल पड़ी। मा ने नाराजगी से जूही को बहोत भला बुरा कहा, जूही चुपचाप सुनती रही..उसे अपनी गलती का अहसास था।
इधर माँ ने बातों बातों में जूही को एक और दिल दहलाने वाली बात कह दी " ..वासवा का वो लड़का जो कल तुझे बाइक पर छोड़ने आया था...जाते हुए रास्ते मे ही उसका एक्सीडेंट हो गया और वो जगह पर ही मर गया!!" जूही को समझ मे नही आया कि वो क्या करें? उसका दम घुटने लगा..माँ भी शुभम के हालचाल पूछने उसके घर गई...जूही ने अपने आपको पलंग पर बिस्तर में झोंक दिया, और सिसकियां लेकर रोने लगी...वो सागर के लिए दिल खोलकर रो भी नही पाती।
जूही की माँ शुभम के घर जा ही रही थी, तब सुबहवाली चाची वहाँ से आ रही थी उसने कहाँ " जूही की माँ, अभी तुम्हारा वहाँ जाना ठीक नहीं है..डॉक्टर ने जवाब दे दिया है, शुभम चल बसा है..उसकी माँ इसके लिए रो रोकर जूही को ही जिम्मवार बता रही है..."
तब जूही की माँ ने कहा.."जो भी कहे मैं सुन लूँगी...वैसे गलती तो जूही की है ही..." ये कहकर.. वो वहाँ जाने लगी।
वहाँ का माहौल बहोत ही हृदयविदारक था..जवान बेटा जो चल बसा था...जूही के पिता भी वहाँ कुछ पुरषों के साथ ग्लानि के साथ खड़े थे..जूही की माँ वहाँ पहोंची और उसने शुभकी रोती बिलखती माँ को थाम लिया और वही उसके साथ बैठ गई...शुभम की माँ "हाय रे मेरा बेटा" कहकर और भी जोरो से फुटफुटकर रोने लगी!! शुभम का निस्चेतन शरीर सामने ही पलंग पर लेटाया हुआ है और उसके तन पर चादर ओढाई हुई है..चहेरा खुला रक्खा है।
बाहर गांवके लोग अंतिम संस्कार की तैयारियों में जुटे हुए है..वातावरण भारी विषाद से भरा हुआ है।
इधर जूही को समझ नहीं आ रहा वो क्या करें..वो मन ही मन रोये जा रहीं है... पर सागर के लिए खुलकर रोना चाहती है पर वो अडोसपड़ोस के लोगों में सोचते, ऐसा करना उसके लिए ठीक नही था...तब सुबहवाली चाची वहाँ एक दो औरतों के साथ आई...और जूही की बाँह पकड़कर उसे झिंझोड़ा और कहाँ...अरे बिटियां ...तेरा तो भाग ही फुट गया..शुभम चल बसा..."
जूही ने जो अबतक रोक रक्खा था वो बांध खुल गया...वो जोर जोर से रोने लगी...कुछ लोग अब उसके घरमे जमा हो गए..उतने में जूही की माँ वहाँ आ गई..." हाय रे अभागन ये क्या कर दिया??" कहकर उससे लिपट गई..जूही भी माँ से लिपटकर रोने लगी...उसे अपने भाग्य पर सचमुच बड़ा दुःखद आश्चर्य हो रहा था...की कैसे भाग्य एक रात में पलट गया...कैसे एक रात में सुहागिन से विधवा हो गई!!
तब ...एक युवक वहाँ पर दौड़ा हुआ आया...और कहाँ "शुभम भैया में फिर से जान आ गई"
ऐसा सुनतें ही सभी आनंद और आश्चर्य मिश्रित भाव सहित, एक एक करके शुभम के घर की तरफ रवाना हुए...जूही और उसकी माँ दोनों ही अब घरमे रह गए...माँ ने उसके आंसू पौंछते हुए कहा "अब सब ठीक हो जाएगा" ।
जूही इस बात स्तब्ध थी..उसके लिए भी यह खबर सांत्वना दे रही थी..पर उसने अपने जीवन से जो गंवाया है, उसके बारेमें वो किसीसे एक शब्द भी नही कहे पा रही..!!
मनुष्य की विवशता की यह एक करुण स्थिति होती है, जहाँ अपना दुःख किसीके साथ बांटना भी असंभव सा हो जाता है।
उधर शुभम के घर का ग़मगीन वातावरण औरतों के रोने धोने के बीच में अचानक बदलाव आया.. जब वहाँ खड़ी छोटी सुमन ने देखा की शुभम के चहेरे पर कुछ हल्कीसी हलचल हो रही है उसने तभी कहा..."देखो शुभम भैया को..देखो आंखों की पलके हिल रहीं है."...तभी शुभम की माँ झटके से उठके शुभम के सिरहाने गई और रोती हुई.. हल्के सेउसके चहेरे को थपथपाती हुई बोली "ए बिटवा शुभम....शुभम.." बाहर जो पुरुष थे उनमें से कुछ अंदर आ गए...कोई कहने लगा "सबलोग एक तरफ हो जाए..गिर्दी कम करो...थोड़ी हवा आने दो.." शुभम के शरीर मे फिर चेतनता आने लगी और वो बुदबुदाया "करुणा...करुणा.….." किसीके समझमे नही आया क्या कहना चाहता है वो...पर माने कहाँ " हां बेटा हां...भगवान की बड़ी करुणा है"...शुभम के शरीर ने धीरे से आंखे खोली..वो कुछ आश्यर्य भरी नजरों से देख रहा...और सर की चोट से कराहने लगा...तब किसीने कहा जाओ डॉक्टर को वापस बुला लाओ... तुरन्त बाहर बाइक स्टार्ट होने की आवाज़ आई..और कोई बाइक पर डॉक्टर को वापिस लाने गया!! किसीने कहा सब लोग बाहर आ जाओ..कमरे में हवा आने दो... शुभ के पिता ने आकर चादर हटा दी..उसकी मां ने दूसरी चादर दी जो उसके पिताने शुभको ओढाई..और शुभम की माँ से कहा "इसे अब आराम करने दो ..थोड़ी देर में डॉक्टर आ जाए..फिर देखते है' शुभम ने अब आंखे बंद की उसकी सांसे पूर्ववत चलने लगी..चहेरे पर अनजान भाव आ रहे थे क्योंकि...भीतर से सागर इस परिस्थिति से कैसे संभले, ये सोच रहा था।
थोड़ी देर में डॉक्टर आ गए उन्हीने सर के चोट को देखा..जरूरी मरहम लगाई और कहा.." खून बहोत बह चुका है.. मैं मरहम पट्टी कर देता हूँ और संजोग में चिट्ठी लिख देता हूँ..वहाँ भर्ती करा दीजिए...वैसे चिंता करने की जरूरत नही है...बस थोड़ा एकाद दो दिन उसके दिमाग को जोर पड़े ऐसी कोई बात न करें"
घर की गाड़ी थी शुभम के चचेरा भाई सभीको गाड़ी में संजोग हॉस्पिटल ले जाने के लिए गाड़ी में बैठने कह रहा था तब वहां जूही और उसकी माँ आई " हम भी साथ चलते है..." शुभम की माँ कुछ कहती उससे पहले शुभम के पिताजी ने कहा "हाँ हाँ..आप दोनों भी बैठ जाओ..मैं किसीके साथ बाइक पर आता हूँ...जूही के पिताजी भी किसीके साथ बाइक पर गाड़ी के पीछे पीछे चल पड़े..गाँव के कुछ युवा भी साथ थे..सभी संजोग हॉस्पिटल की और रवाना हुए।
क्रमशः