Thursday, January 20, 2022

३.सागर की करुणा या करुणा का सागर-एक गज़ब प्रेमकथा!!

 


 

उसने देखा की वो अपने आपको बिल्कुल हल्का हल्का सा महसूस कर रहा है, कुछ दूर पर उसकी बाइक रास्ते पर पटकी पड़ी है, और उसी से कुछ कदम दूर उसका निश्चेतन शरीर!! वो कुछ सोचे उसके पहले दूर से आतीं उस प्रकाश की किरन ने जैसे उसे मोह लिया, उस मनमोहक प्रकाश की और मानो जैसे अनायास ही वो खिंचा चला गया..और इस गतिविधिमें उसने एक अपार आनंद और प्रेमका अहसास हुआ!!

कुछ क्षणोमे उसने अपने आपको एक गार्डन में बैठा पाया, वो एक सुंदर नक्काशीदार सफेद बेंच पर  बैठा है, और आसपास का वातावरण इतना सुकून देनेवाला और आनंददायक था कि उसके लिए शब्द ही न जुट सके!! उस गार्डन के फूल, फ़ूलोंके रंग, हरियाली खशबू इस धरती पर कभी न पाई जा सकेगी ऐसी अद्भुत और अलौकिक, वो स्वर्गमें था। उसे अंदर से यह एहसास हुआ जैसे वो किसीकी प्रतीक्षा कर रहा है वहाँ, और अभी कोई आएगा उसे मिलने, पर कौन आएगा उसका उसे अंदेशा नही था...वो उस परम आनंददायक वातावरण में खो सा जा रहा था....तब एक प्रकाशपुंज की बनी व्यक्ति वहाँ प्रकट हुई, मानो उस व्यक्ति का शरीर शुभ्र प्रकाश से बना हुआ है, उसने मानो क्षणभर उसे करुणाभरी आंखों से देखा, उस प्रकाशरूप आकृति का उसे इस तरहा देखना भर था कि वो  उसको देखते ही छोटे बच्चे की तरहा, हिचकियां दे दे कर रोने लगा, मानो जैसे कितने जन्मों से बिछड़कर आज मिलन हुआ हो!!

...और उस छोर से एक प्रश्न आया "कहा थे अबतक?" यह प्रश्न उसके लिए सूचक था, यह कोई शब्दो के बोल नही थे, शायद टेलीपैथी जैसा कुछ था!! यह प्रश्न उपस्थित होते ही, उसके जीवन की सारी घटनाएं जैसे किसी चलचित्र के भांति उसके मस्तिष्क की आँखों के सामने एक एक करके दृश्यमान होने लगे..बचपन के पालने से लेकर मा-बाबूजी बचपन के दोस्त, स्कूल कॉलेज के साथी उनके साथ बीते अंतरंग पल...सबकुछ एक भी घटना छूटी नहीं सबकुछ जैसा अभी घट रहा हो..और वो बिल्कुल स्तब्धसा उन घटनाओंको मानो किसी साक्षी की तरहा देख रहा हो...और अंतिम घटना के दृश्य द्रश्यमान हुए....

निशा की शादी हो चुकी है, और उसकी बिदाई की रस्म पूरी हो चुकी थी बारात अपनी गाँव दूल्हा- दुल्हन को लेकर चले गए थे और उसने देखा करुणा पीछे रह गई है, कुछ कीचड़ सा रास्ते मे होगा, जिस पर करुणा का पांव फिसला और उसके पैरोमे कीचड़ लग गया, और उसकी एक चप्पल भी किचड़वाली हो गई...तभी वो वहाँ से गुजरा था..और करुणा की सहेली उसे कहे रही थी "अरे जूही चलो..ये बारातियों की आखरी बस है और आज तो बारिश होनी है" और जूही बोली "तुम चलो मैं पैर धो कर आती हु" तभी वो वहाँ पहोचा और उसने हँसते हुए कहा था "अरे करुणा क्या हुआ? कीचड़ में पैर चला गया..हा हा हा हा" जूही ने उसे एक शरारती गुस्से भरी नजर से देखा और कहा था "तुम्हारें गांव वाले देखो कितनी गंदगी करके रखते है!!" तभी उसने कहा था "हमारे गांववाले नही..ये तुम्हारे गाँव के बारातियों की सब करतूत है हा हा हा हा" तब जूही ने कहा था "अब मज़ाक बन्द करो और पैर धुलवावो, एक तो बारिश होनेवाली है,और हमारीं बस भी अभी आखरी है" तभी सड़क के पास एक पानी की डंकी पर वो उसे ले गया और हेंडपम्प चलाकर पानी डंकी में चलाया जूही ने अपने पैर और चप्पल अच्छी तरहा से धो लिए...और फिर दोनों बारातियों की आखरी बस की और जाने लगे ..उसने पूछा था "करुणा अब फिर कब मिलेंगे? जूही ने शरारती लहजे में कहा था "मुझे क्या पता!!!

जैसे वो बस वाली जगह पर पहोचे तो देखा कि बस चली गई थी उसने वहाँ खड़े गांव के एक बुजुर्ग से पूछा "अरे काका बरातियों की बस चली गई? बुजुर्ग ने कहा "अभी अभी आखरी वाली बस निकली है" जूही का चहेरा देखते बनता था उसने सागर की और देखा "अब?? तब साग़र ने उसे कहा था "ये बंदा किस लिए है, करुणा..तुम ठहरो में अभी बाइक ले कर आता हूँ..और तुम्हे बस तक पहोचा दूंगा..जूही ने सहमति दर्शाई और सागर उसके घर बाइक लेने गया और चंद मिन्टोमे बाइक के साथ लौटा..जूही पीछे बैठ गयी और उसने बाइक स्टार्ट कर दी...यहाँ बारिश की बौछारें पड़ने लगी देखते देखते बारिश तेज़ हो गई..तब उसने सोचा कि आगे बढ़ने से अच्छा है कहीं रुक जाए...एक बड़े पेड के नीचे जा कर दोनों ख़ड़े हो गए..भीगना तो अनिवार्य था, क्योंके और बारिश से बचने का कोई उपाय भी नही!!!

उस देर शाम में बारिश की बौछार और दो प्रेमी एक दूसरे के प्रेम में आसक्त, बाहर का वातावरण आल्हादक और मन को एक अलग ही प्रकारके अहसास की और दोनों को खिंचे जा रहा था, उसने झटके से उसकी करुणा को अपनी आगोश में खींच लिया, करुणा भी निःसहाय सी उसके बाहोंमें समाने लगी...एक आह्लादक अलौकिक आकर्षण दोनों के मन से होकर तन में कब गुज़र गया कुछ पता न चला..कब करुणा सागर की हो गई और सागर करुणा का..जब अहसास हुआ जब लौकिक बातोंसे मन फिर अपना अस्तित्व पाने की कोशिश कर रहा..और दोनोंने लौकिक अहसास को पाते
ही यह समझा कि कुछ अनचाहा पर मनचाहा हो चुका था अनजाने ही या अस्तित्व के बोध के साथ ये तय करना दोनों के लिए असम्भव सा था...तब करुणा ने उससे कहा था "आज करुणा सागर की हो गई..अब ये सागर का उत्तरदायित्व है कि अब सागर करुणा का हो जाये"

इस पर उसने कहा था "अब सागर से करुणा को दुनियां की कोई शक्ति दूर नही रख सकती"  "मेरा विश्वास रखना"

तब करुणा ने कहाँ था " मुझे मुझसे भी ज्यादा अब तुम पर विश्वास है"

दोनों ने अपने आप को संभल लिया और दोनों बाइक पर फिर सवार हो गए, करुणा सागर के पीठ पर सर रखकर बिल्कुल निश्चिंत सी हो चुकी थी, बारिश रुक चुकी थी,तूफान शम चुका था..और दोनों बिल्कुल निःशब्द ..बाइक भीनी सड़क पर जूही के गांव की और दौड़ रही थी।

कुछ समय के बाद वो दोनों पहोंचे, बाराती अभी पहोचे ही थे, कुछ लोग बसों से अभी भी उतर रहे थे, तब कहीं से शुभम आया उसने जूही को सागर के साथ बाइक से उतरते देखा और उसके मन में एक अनजाना सा पर अनिच्छनिय भाव आ गए..उसने पूछ लिए "कहा रुक गयी थी? सभी के साथ आने को नही हुआ क्या? मुन्नी तो तुम्हारे साथ थी!!"

सागर ने सारी हक़ीक़त शुभम को बताई की, वो किस तरहा कीचड़ में पैर फिसला और लास्ट बस छूट गयी। सागर और शुभम के साथ यही एक मुलाकात रही.. वहां पर चिंतित होते जूही की मम्मी आ गई जूही उनके साथ हो गई और सागर अपनी बाइक लेकर लौट पड़ा था अपनी गाँव की और...

सागर रोने लगा उसने उस प्रकाशपुंज व्यक्तित्व से कहाँ "है भगवन है विधाता..मैं करुणा के बगैर संसार मे कहीं भी नही रहे सकता...मुझे जाना होगा..उस पर तो न जानें क्या गुजरेगी? वो सह नही पाएगी प्रभु..मुझे जाना है..मुझे जाना ही होगा!!

उस दिव्य पुरुष ने कहां "पर तुम देखो ..तुम्हारा पार्थिव शरीर अब किस काम का नहीं रहा..और लोग उसके अंतिमसंस्कार की विधि भी कर रहे है...सागर ने देखा उसकी माँ बार बार सदमें से बेहोश होती जा रही है, उसके पापा बिल्कुल निश्चेतन से अपलक नज़रो के साथ गुमसुम से बैठे थे और और गांव के लोग उसके पार्थिव शरीर की अन्तिमयात्रा की विधि कर रहे थे...सागर ने देखा सबकुछ खत्म हो चुका है...पर करुणा से किये वादे को याद आते ही अवसाद में डूबे स्वर में उसने कहा "प्रभु दया कीजिए"

उस प्रकाशपुरुष ने कहा..."पुत्र तुम्हारी जिजिविषा और अंतिम कर्म के फल की पूर्ति के हेतु ..और तुम्हारी जिद्दभरी आह और चाहना से मुझे विधि के लेख में बदलाव नज़र  आ रहा है....जाओ वहाँ जूही का मंगेतर प्राण त्याग रहा है..उसके शरीर मे चले जाओ...सागर ने पूछा कैसे...दिव्यात्मा ने उसके कपाल के स्थान पर आए आज्ञाचक्र पर स्पर्श किया और हल्का सा दबाव दे कर कहा " ऐसे!!"

और सागर अब शुभम के पार्थिव देह में आ चुका था और शुभम एक लंबी परलोक यात्रा के लिए उसका पार्थिव शरीर हमेशा के लिए छोड़ चुका था!!!
क्रमशः


No comments:

Post a Comment

४.सागर की करुणा या करुणा का सागर-एक गज़ब प्रेमकथा!!

      जूही अपनी पड़ोसवाली चाची के संग गाँव की एक नदी पर कपड़े धोने आई है.. अक्सर गांव के लोग हफ्ताभर के मैले कपड़े, खासकर के बड़ी चद्दर या कम्बल...